फ़िरोज़ ख़ान

***********राजेंद्र यादव की याद में मर्सिया********
जो अब चला गया तो अफसोस क्यों है
किसलिए ये मर्सिये
गमज़दा हो किसलिए
तुम्हारी महफिल में था जो बैठा
शाम ढलते, रात होते
तुम्हारे ताने, तुम्हारे फिकरे
सुन रहा था वो सब मुस्कुरा के
हजार उँगलियाँ थीं उसकी जानिब
काले चश्मे की जिल्द से वो
यूँ देखता था कि कुछ कहेगा
उतरते चाँद तक जो था साथ तुम्हारे
भोर होने से पहले उठा अचानक
सोचा कि कहे 'ये सभा बर्खास्त होती है'
फिर ये सोचकर चुपचाप चल दिया होगा
कि फैसले हाकिम सुनाते हैं
इस बीच टूटा होगा कोर्इ तारा
और टूटती साँसों के बीच शायद कहा होगा उसने
'इस महफिल को रखना आबाद साथी'
या फिर
कहते-कहते वो रुक गया होगा
क्योंकि फैसले हाकिम सुनाते हैं
**************रक्त-सने समय में कवि***************
कविता आकर पूछेगी कवि से
कैसे तुम इतना खुश रह लेते हो भाई
नेता, मंत्री, पुलिस का अफसर, सेठ-व्यापारी, जेलर चाचा
सबको खुश रख लेते हो कैसे
ये हुनर कहाँ से सीखा तुमने
कविता आकर पूछेगी कवि से
जिन जिस्मों पर फटे-पुराने कपड़े-लत्ते माँगे के हैं
दुख की पपड़ी होंठ पर जिनके जमी हुई है
जिनके घर फुटपाथ हैं और डामर जिनके पैखाने हैं
जो सोते-सोते कार के नीचे मर जाते हैं
जो बनाते हैं सड़कें, गलियाँ, महल-अटारी
चौकीदारी करते हैं जो
दफ्तरों में क्लर्की करते-करते जो मर जाते हैं
वे सब तुम्हारी कविता में हैं लेकिन
कविता आकर पूछेगी कवि से
वे सब तुम्हारी कविता में क्यों हैं
कविता केवल करुणा है क्या
और वह पूछेगी कि
जिनकी वजह से हालात हैं ऐसे
उनसे तुम क्यों कुछ नहीं कहते
कविता ये पूछेगी कवि से
किसकी तरफ है चेहरा तुम्हारा
किसकी तरफ से पीठ घुमाए
सवाल तुम्हारे किन से हैं और
कितने तुमने खतरे उठाए
कविता पूछेगी कवि से
कैसे तुम इतना खुश रह लेते हो भाई


****************युद्ध के खिलाफ एक कविता**********
भले मुझे निष्कासित कर दो
इस मुल्क, इस दुनिया-जहान से
लेकिन मैं एक अपराध करना चाहता हूँ
मैं चाहता हूँ
बगैर हथियारों वाली एक दुनिया
मैं चाहता हूँ
हजरत नूह की तरह मैं भी एक नाव बनाऊँ
दुनिया के तमाम हथियार भर दूँ उसमें
और बहा दूँ किसी बरमूड़ा ट्राइंगल की जानिब
मैं बेदखल कर देना चाहता हूँ
दुनियाभर की तमाम पुलिस फोर्स को
छीन लेना चाहता हूँ फौजियों के मेडल
जो सरहदों पर किन्हीं के खून का हिसाब हैं
मैं सरहदों को मिटा देना चाहता हूँ
या कि वहाँ बिठा देना चाहता हूँ
फौजियों की जगह दीवानों को
मीरा को, सूर, कबीर, खुसरो, फरीद, मीर, गालिब, फैज, जालिब और निदा को
इतिहास की किताबों से पोंछ देना चाहता हूँ
जीत की गाथाएँ
हार की बेचैनियाँ
ध्वस्त कर देना चाहता हूँ
किलों, महलों में टँके जंग के प्रतीक चिह्न
संग्रहालयों में रखे हथियारों की जगह रख देना चाहता हूँ
दुनियाभर के प्रेमपत्र
मैं लौट जाना चाहता हूँ हजारों साल पीछे
और मिटा देना चाहता हूँ
तमाम धर्मग्रंथों से युद्ध के किस्से
छीन लेना चाहता हूँ राम के हाथ से धनुष
राजाओं, शहंशाहों के हाथ से तलवार
मिटा देना चाहता हूँ
कर्बला की इबारत
मैं कुरुक्षेत्र, कर्बला और तमाम युद्धस्थलों को लिख देना चाहता हूँ
खेल के मैदान
मैं कविताओं से सोख लेना चाहता हूँ वीर रस
एक कप चाय के बदले सूरज की तपिश को दे देना चाहता हूँ
तमाम डिक्शनरियों के हिंसक शब्द
हिंसा के खिलाफ कहे और लिखे गए मैं अपने हिंसक शब्दों के लिए माफी चाहता हूँ
*************पुलिस***************
सपनों में अक्सर पुलिस आती है
महीनों से
नहीं, नहीं... शायद सालों से
घसीट कर ले जा रही होती है पुलिस
धकेल देती है एक सँकरी कोठरी में
और जैसे ही फटकारती है डंडा
मैं चीख पड़ता हूँ
जाग कर उठते हुए
कब से जारी है यह सिलसिला
माँ के खुरदरे और ठंडे हाथ
हथकड़ी से लगते थे उस वक्त माथे पर
सर्दियों में भी माथे की नमी से जान गया था कि
डर का रंग गीला और गरम होता है
जलता हुआ चिपचिपा रंग
सपना देखा कोई?
माँ पूछती तो अनसुना कर
टेबुल पर रखी घड़ी की ओर लपकता
दादी कहती थीं कि भोर के सपने सच होते हैं
माँ से कहता था कि मेरे ऊपर हाथ रखके सोया करो
रथ परेशान करते हैं मुझे
माँ कहती थी कि टीवी पर महाभारत मत देखा करो
अब मैं माँ को कैसे समझाता कि
रथ में मुझे अर्जुन नहीं दिखते
कृष्ण के हाथ लगाम नहीं होती रथ की
पुलिस दिखती है
जहाँ-जहाँ से गुजरता है रथ
पुलिस ही पुलिस होती है चारों ओर
मेरी तरफ दौड़ती है
नाम पूछती है और दबोच लेती है मुझे
2.
रीना को भ्रम हो गया है कि
बहुत प्यार करता हूँ मैं उन्हें
हमेशा सोता हूँ उन्हें बाँहों में समेटकर
अब कैसे बताऊँ कि डरता हूँ मैं
इस डर में कोई कैसे प्यार कर सकता है
3.
अकेला हूँ इन दिनों
नहीं, नहीं
सपनों के डर के साथ हूँ
घर के दरवाजे से नेम प्लेट हटा दी है मैंने
घर में कोई कैलेंडर भी नहीं
सारे निशान मिटा दिए हैं
मेरे नाम को साबित करने वाले
फिर भी आती है पुलिस
सपनों में बार-बार
कई रोज हुए, मैं सोया नहीं हूँ
4.
डर का रंग सफेद होता हैं
नहीं, नहीं ! भूरा होता है
बड़े-बूढ़ों से यही सुना था मैंने
लेकिन मेरे घर में तो कई रंगों में मौजूद है डर
कल रात की बात है
जब किसी ने जोर-जोर से पीटा था दरवाजा
मैं समझ गया था
डर खाकी रंग में आया है
*******************एक कविता बेटी शीरीं के नाम ***********
मेरी आँखों का अधूरा ख्वाब हो तुम
आधी नींद का टूटा हुआ-सा ख्वाब
मेरे लिए तो तुम वैसे ही आई
जैसे मजलूमों की दुआएँ सुनकर
सदियों के बाद आए
पैगंबर
या कि मथुरा की उस जेल में
एक बेबस माँ की कोख
में पलता एक सपना
पैवस्त हुआ हो
मुक्ति के इंतजार में
मैं जानता हूँ कि
तुम्हारे पास न कोई छड़ी है पैगंबरी
और न ही कोई सुदर्शन चक्र
दुनिया के लिए
तुम होगी सिर्फ एक औरत
एक देह
और होंगी
निशाना साधतीं कुछ नजरें
तुम्हारे आने की खुशी है बहुत
दुख नहीं, डर है
कि पैगंबर के बंदे अब
ठंडा गोश्त नहीं खाते
(2.)
मैंने देखा
तुम आई हो
आई हो तो खुशआमदीद
आधी दुनिया तुम्हारी है
जबकि मैं जानता हूँ कि
इस आधी दुनिया के लिए
तुम्हें लड़ना होगी पूरी एक लड़ाई
तुम्हारी इस आधी दुनिया
और मेरी आधी दुनिया का सच
नहीं हो सकता एक
तुम आई हो तब
जबकि खतों के अल्फाज़
दिखते हैं कुछ उदास
कागज पर नहीं दिखता
****************..और ईश्वर मर जाएगा**************
ये भोर ठंडी है एकदम
जैसे कि ठंडा है
मेरा जिस्म
ठंडी चीजें मर जाती हैं
मैं भी मर जाऊँगा एक रोज
मेरे मरते ही मर जाएगा
ये शहर
ये वतन
ये दुनिया मर जाएगी मेरे मरते ही
स्मृतियाँ मर जाएँगी
मर जाएँगी मेरी प्रेमिकाएँ
मेरी माँ मर जाएगी
जिसके मरने का सताता रहा है डर
वो पिता मर जाएगा
मेरे मरते ही
वे सब मर जाएँगे
जिनके जीने की दुआएँ की थीं
मैं एक खंडहर हूँ
या कि हूँ एक ईश्वर
ढह जाऊँगा एक रोज मैं
मर जाऊँगा
मेरे मरते मर जाएगा
ईश्वर भी

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