शनिवार, 7 दिसंबर 2019

Short story




पुराने जमाने की बात है। एक आदमी को अपराध में पकड़ा गया। उसे राजा के सामने पेश किया गया। उन दिनों चोरो को फाँसी की सजा दी जाती थी। अपराध सिद्ध हो जाने पर इस आदमी को भी फाँसी की सजा मिली। राजा ने कहा, 'फाँसी पर चढ़ने से पहले तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ।'
आदमी ने कहा, 'राजन! मैं मोती तैयार करना जानता हूँ। मेरी इच्छा है कि मरने से पहले कुछ मोती तैयार कर जाऊँ।'
राजा ने उसकी बात मान ली और उसे कुछ दिन के लिए छोड़ दिया।




आदमी ने महल के पास एक खेत की जमीन को अच्छी तरह खोदा और समतल किया। राजा और उसके अधिकारी वहाँ मौजूद थे।
खेत ठीक होने पर उसने राजा से कहा, 'महाराज, मोती बोने के लिए जमीन तैयार है, लेकिन इसमें बीज वही डाल सकेगा, जिसने तन से या मन से कभी चोरी न की हो। मैं तो चोर हूँ, इसलिए बीज नहीं डाल सकता।'
राजा ने अपने अधिकारियों की ओर देखा। कोई भी उठकर नहीं आया।
तब राजा ने कहा, 'मैं तुम्हारी सजा माफ करता हूँ। हम सब चोर हैं। चोर चोर को क्या दंड देगा!'

नशे का तमाशा
एक आदमी बड़ा शराबी था। शाम होते ही वह शराबघर में पहुँच जाता और खूब शराब पीता। एक दिन उसने इतनी चढ़ाई कि चलते समय उसे पूरा होश न रहा। वह साथ में लालटेन लाया था। उठाकर घर की ओर चल दिया। रास्ते में गहरा अँधेरा था। उसने लालटेन को इधर घुमाया, उधर घुमाया और जब उससे रोशनी न मिली तो उसने जी भरकर उसे गालियाँ दीं।
घर आकर उसने लालटेन को बाहर पटक दिया और घर के अंदर जाकर सो गया।
सवेरे जैसे ही उठा तो देखता क्या है कि शराबघर का आदमी उसकी लालटेन लिए चला आ रहा है। उसे बड़ा अचरज हुआ कि वह लालटेन उसके हाथ में कैसे है!




पास आकर वह बोला, 'महाशयजी, रात को आपने अच्छा तमाशा किया! अपनी लालटेन छोड़ आए और हमारा पिंजड़ा उठा लाए। लीजिए, अपनी यह लालटेन और हमारा पिंजड़ा हमें दीजिए।'
यह सुनकर उस आदमी को अपनी भूल मालूम हुई। नशे में रात को सचमुच वह लालटेन नहीं, पिंजड़ा उठा लाया था।

दान का आनंद 





एक राजा थे। वह बड़े ही उदार थे। दानी तो इतने कि खाने-पीने की जो भी चीज होती, अक्सर भूखों को बाँट देते और स्वयं पानी पीकर रह जाते।
एक बार ऐसा संयोग हुआ कि उन्हें कई दिनों तक भोजन न मिला। उसके बाद मिला तो थाल भरकर मिला। उसमें से भूखों को बाँटकर जो बचा, उसे खाने बैठे कि एक और व्यक्ति आ गया। वह बोला, 'महाराज! मुझे कुछ दीजिए।'
राजा ने थाल में से थोड़ी-थोड़ी चीजें उठाकर उसे दे दीं। फिर जैसे ही खाने को हुए कि एक व्यक्ति और आ गया। राजा ने खुशी-खुशी उसे भी कुछ दे दिया। उसके जाते ही एक और दीन-हीन आ गया। राजा ने बचा-बचाया सब उसे दे दिया। मन-ही-मन सोचा, कितना अच्छा हुआ, जो इतनों का काम चला! मेरा क्या है, पानी पीकर मजे में अपनी गुजर कर लूँगा।
इतना कहकर वह जैसे ही पानी पीने लगे कि हाँफता हुआ एक कुत्ता वहाँ आ गया। गर्मी से वह बेहाल हो रहा था। राजा ने झट पानी का बर्तन उठाकर उसके सामने रख दिया। कुत्ता सारा पानी पी गया।
राजा को न खाना मिला, न पानी, पर उसे जो मिला उसका मूल्य कौन आँक सकता है!
तोड़ो नहीं, जोड़ो

अंगुलिमाल नाम का एक बहुत बड़ा डाकू था। वह लोगों को मारकर उनकी उँगलियाँ काट लेता था और उनकी माला पहनता था। इसी से उसका यह नाम पड़ा था। आदमियों को लूट लेना, उनकी जान ले लेना, उसके बाएँ हाथ का खेल था। लोग उससे डरते थे। उसका नाम सुनते ही उनके प्राण सूख जाते थे।
संयोग से एक बार भगवान बुद्ध उपदेश देते हुए उधर आ निकले। लोगों ने उनसे प्रार्थना की कि वह वहाँ से चले जाएँ। अंगुलिमाल ऐसा डाकू है, जो किसी के आगे नहीं झुकता।
बुद्ध ने लोगों की बात सुनी, पर उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला। वह बेधड़क वहाँ घूमने लगे।




जब अंगुलिमाल को इसका पता चला तो वह झुँझलाकर बुद्ध के पास आया। वह उन्हें मार डालना चाहता था, लेकिन जब उसने बुद्ध को मुस्कराकर प्यार से उसका स्वागत करते देखा तो उसका पत्थर का दिल कुछ मुलायम हो गया।
बुद्ध ने उससे कहा, 'क्यों भाई, सामने के पेड़ से चार पत्ते तोड़ लाओगे?'
अंगुलिमाल के लिए यह काम क्या मुश्किल था! वह दौड़ कर गया और जरा-सी देर में पत्ते तोड़कर ले आया।
'बुद्ध ने कहा, अब एक काम करो। जहाँ से इन पत्तों को तोड़कर लाए हो, वहीं इन्हें लगा आओ।'
अंगुलिमाल बोला, 'यह कैसे हो सकता है?'
बुद्ध ने कहा, 'भैया! जब जानते हो कि टूटा जुड़ता नहीं तो फिर तोड़ने का काम क्यों करते हो?'
इतना सुनते ही अंगुलिमाल को बोध हो गया और वह उस दिन से अपना पेशा छोड़कर बुद्ध की शरण में आ गया।
आखिरी दरवाजा 




एक फकीर था। वह भीख माँगकर अपनी गुजर-बसर किया करता था। भीख माँगते-माँगते वह बूढ़ा हो गया। उसे आँखों से कम दिखने लगा।
एक दिन भीख माँगते हुए वह एक जगह पहुँचा और आवाज लगाई। किसी ने कहा, 'आगे बढ़ो! यह ऐसे आदमी का घर नहीं है, जो तुम्हें कुछ दे सके।'
फकीर ने पूछा, 'भैया! आखिर इस घर का मालिक कौन है, जो किसी को कुछ नहीं देता?'
उस आदमी ने कहा, 'अरे पागल! तू इतना भी नहीं जानता कि यह मस्जिद है? इस घर का मालिक खुद अल्लाह है।'
फकीर के भीतर से तभी कोई बोल उठा - यह लो, आखिरी दरवाजा आ गया। इससे आगे अब और कोई दरवाजा कहाँ है?
इतना सुनकर फकीर ने कहा, 'अब मैं यहाँ से खाली हाथ नहीं लौटूँगा। जो यहाँ से खाली हाथ लौट गए, उनके भरे हाथों की भी क्या कीमत है!'
फकीर वहीं रुक गया और फिर कभी कहीं नहीं गया। कुछ समय बाद जब उस बूढ़े फकीर का अंतिम क्षण आया तो लोगों ने देखा, वह उस समय भी मस्ती से नाच रहा था।